Monday, September 7, 2009

देशक अवस्‍था आ जनताक प्रवृति

— मनोज झा मुक्‍ति

एखनुक परिवेशमे ककरोसँ पुछियौक देशक अवस्‍था केहन अछि ? त, कहता किकहू सभ ठाम भ्रष्‍टाचारे भ्रष्‍टाचार व्‍याप्‍त अछि । देशक नेता भ्रष्‍ट, कर्मचारी तन्‍त्रभ्रष्‍ट, पत्रकारिता जगत भ्रष्‍ट, व्‍यापारी भ्रष्‍ट...आर किदन किदन...सभचीज भ्रष्‍टेभ्रष्‍ट, तहन देशक स्‍थितिके कि कहबैक...। देशक स्‍थिति निश्‍चितरुपेण नीक त नहिंए अछि, मुदा एकर दोषी के ? सभजौं भ्रष्‍टाचारिए अछि त नीक व्‍यक्‍ति केओ नहिं ? आ देशक जनता कि दूधकधोएल अछि ? सबकेँ एकवेर अपना छातीपर हाथ राखिकऽ सोंचहिटा पड़त । आखिरकिया देशक हालति एहि तरहें दिनानुदिन खसकैत जाऽरहल अछि ? देशमें सब तरहक लोक हाएव कोनो आश्‍चर्यक गप्‍प नहिं ।

सबहक कहब ईछन्‍हि जे सभक्षेत्रमे भ्रष्‍टाचारीए लोकक चलाचल्‍ती छैक । अईसँ असहमत बहुतकम्‍मेगोटे हएता । मुदा यहो सत्‍ये छैक जे सत्‍यक बाटपर धिरे—धिरे आगा ससरैतलोक सेहो अई देशमे अछि । हँ, सत्‍यवादी धारमे लागल खाँटी राष्‍ट्रवादी सभकसँख्‍या बहुत कम अछि आ दिनानुदिन ओहि सँख्‍यामे ह्रास होइत जाऽरहल अछि ।तकर कारण कि ? जौं स्‍पष्‍टरुपसँ कहल जाए त दशक एहि परिस्‍थितिक जिम्‍मेवार आन केओनहिं, हमहि आँहाँ छी । हमही आँहाँ देशक नेताके, व्‍यापारी आ कर्मचारीकेँभ्रष्‍टाचारी बनावि रहल छियैक । हम आँहाँ एकटा नेताके भ्रष्‍टाचार करबालेल विवश कऽ दैत छियैक । जौंगाममे एकटा कोनो नेता साइकलपर चढिकऽ अवैत अछि या पैदल अवैत अछि तओकरा देखबाकले कोना जनता नहिं जाइत छियैक ।

एतवे नहिं ओई नेताकेअपना दरबज्‍जापर बैसऽदेवमें सेहो हमसब अपनाआपके हीन महशुस करैत छी । आ हमरे आँहाँक गाममे जौं एकटा नेता महँग गाड़ीमे चढिकऽ अवैत अछि त ओकरापाछा या कहु स्‍वागत करबाकलेल माइए पुते दौड़ैत छियैक, ओकरा अपनादरबज्‍जापर बैसबऽमे हमसब अपनाके गर्वान्‍वित भेल अनुभूति करैत छी । चुनावकसमयमे कतबो सकारात्‍मक सोंंचवला नेता किएक नहिं हुअए ओकरा भोंट देवाकबदलामें हमसब मतपत्रमे अपन जातिक उम्‍मेदवारके चिन्‍हमे मोहर लगवैत छी ।ओतवे नहिं अपन मतक महत्‍वके बुझितो हमसब अपना मतके पाई लऽ कऽ बेचि दैतछियैक जकर कारणसँ जकरालग अपन जातिक जनसँख्‍या वेसी अछि आ वेसी पाई अछिवएह नेता चुनाव जितैत छथि । कि हमर आँहाँक एहि तरहक व्‍यवहार एकटा नेताकेँभ्रष्‍ट बनवाकलेल विवश नहिं करैत छैक ।

जौं जातिक नामपर केओ जितैत अछि तओ अपना जातिक वाहेक आन जनताके वारेमे किया सोंचत ? आ अपना जातिकलेलसेहो किछु नहिं कऽसकैया, कियाक त ओ ई नीक जकाँ बुझने रर्हैत अछि जेअपना जातिकलेल हम काज नहिंयो करब तखनो हमर जाति हमरा भोंट देबेटा करत। आ ओ जे पजेरोबला नेता आ पाईबला नेताक तुलनामें अपनाके निरीहबुझैत अछि, ओहो हमरा आँहाँक सामिप्‍यता पएवाकलेल आ चुनाव जीतवाकलेलपाईएके अपना जीवनक सभसँ पैघ लक्ष्‍य बुझि ‘एनि हाउ, पाई कमाऊ’ के नीतिअवलम्‍वन कऽलैत अछि । आ जखन ओ पाइएक बलपर हमरआँहाँक भोट लेत त कियाहमरा आँहाँक विकासकलेल ओ सोंचताह ?

तहिना देशक कर्मचारिके हमही आँहाँसब अपन काज जल्‍दीसँ जल्‍दी करेबाकलेलया कानूनन नहिंयो होबऽवला काज गैरकानूनन रुपसँ करेबाकलेल घुस देल करैतछियैक आ एहिं तरहें एकटा कर्मचारीकेँ जवरदस्‍ती हमसब भ्रष्‍टारी बना दैत छियैक। ओनो कर्मचारीयो खासकऽ एकटा पुलिसमे जेबाकलेल हाकिम एकलाख टका लेलकरैत छैक, हाकिमके डाइरेक्‍टर बनेवाकलेल मन्‍त्रीद्वारा लाखो रुपैया घूस लेल जाइतछैक । जहन ओ कर्ज पैंच लऽ कऽ बहाल भेल रहैत छैक त कोनो बहन्‍ने कमेबेटाकरतैक । एकटा व्‍यापारीकेँ काला बाज़ारी करबामे सेहो हमसब अपने बहुत बेसीदोषी छी । हमसब बुझितो रहैत छि तइयो ओकर विरोधमे बजबाक हिम्‍मत नईकरैत छियैक ? हमरा आँहाँलेल के बाजि देत ? ककरो लग ओतेक फुरसति नहिंछैक ।

हमसब सबके भ्रष्‍टाचारी त कहैत छियैक, मुदा अपन टेटर नहिं देखैत छी ।सरकार अपन गाम अपने बनाबु कहिकऽ प्रत्‍येक गाममे १५ सँ ३० लाखधरि रुपैयाप्रतिवर्ष देल करैत अछि । गामक विकास कतेक भेल छैक, विशेषकऽ मधेशमे सेककरोसँ छुपल नहिं अछि । सभ पार्टीक प्रतिनिधिसब अपन बपौटी(पैत्रृक) सम्‍पतिबुझि खुलेआम लुटैत अछि आ हम आँहाँ मौन भऽ सबकिछु देखैत रहैछी । जौंकियो व्‍यक्‍ति ओइ काजक विरोध करैत छैक त हमहि आँहा केओ पार्टीक नामपर,केओ जातिक नामपर ओहन भ्रष्‍टाचारीकेा दूधक धोएल बनाऽदैत छियैक ।

ओहनभ्रष्‍टाचारीकलेल पार्टीयोसब अपन प्रतिष्‍ठाधरि दाओपर लगा दैत अछि ओकराबँचवऽमें । एकरा अरिक्‍त जे किछु कोनो गामठाममे जौं छोटछीन विकासक काजहोइत अछि त ओकरा विनाश करबामें हमसब बहादुरी बुझैत छी । अपना घरकअगााक सडकपर राखलगेल ग्राभेलक पाथर अपना घरमे घुसियाबऽमे त हमरा सबकेजोरा सम्‍भवतः कतौ नहिं भेटत । एतेक धरि कि सरकार विद्यालयसबके व्‍यवस्‍थित करबाकलेल अपनेगामक स्‍थानियव्‍यक्‍तिक अनुसारे चलेवाकलेल विद्यालय व्‍यवस्‍थापन समीतिके निर्माण योजना लाबिप्रायः सभ विद्यालयके समुदायमे हस्‍तान्‍तरण केलक, मुदा विद्यालय व्‍यवस्‍थापन समीतिअखन मात्र पाई कमेबाक एकटा स्‍थलक रुपमें परिणत भऽगेल अछि । चाहे विद्यालयमेशिक्षकक रखबामे होय या शिक्षककेँ सरुवामें हुए, विशेष कऽ मधेशक प्रत्‍येकविद्यालय व्‍यवस्‍थापन समीतिसभ एहि तरहक व्‍यापारमें लागिगेल अछि ।

विद्यालयक पढाईकेहन छैक, शिक्षक विद्यालयमें अवैत अछि कि नहिं, विधार्थी अवैत अछि कि नहिंताहिसँ व्‍यवस्‍थापन समीतिके कोनो मतलव नई रहल देखल जाऽरहल अछि । एहि तरहें देशक विकास कोना हायत ? जाधरि हमसब अपने नहिं सुधरब तआन के सुधारत ? जौं हमसभ एकटा सत्‍य बाटपर चलनिहार, देशभकत आ जनताकसमस्‍याके अपन बुझऽबला नेताक बदलामे तामझामबला पँजेरो एनिहार नेताकेनिरुत्‍साही नहिं करब त दिनानुदिन भ्रष्‍टाचारक दलदलमें हमसब धँसैत जाएब । सत्‍यकपक्षधरके मनोबल बढेनाई जरुरी आ सभक कर्तव्‍य भऽगेल अछि । आन कियो कियाहमरा आँहाँक सम्‍बन्‍धमे सोंचि देत ? ताएँ आनके दोष देबासँ पहिने एकवेरहमसभ अपने टेटर देखब कि ?

टेष्‍ट परीक्षा आबऽलागल, मैथिलीक विद्यार्थी पुस्‍तक बिहीन

मनोज झा मुक्ति
शैक्षिक वर्षक अन्‍त होमऽ लागल अछि, किछु दिनकवाद दशम कक्षाक टेष्‍ट परीक्षा सेहो हएत । आन आन विषयक विद्यार्थीक कोर्स अन्‍तो होमऽलागल अछि, मुदा हिलसि कऽ अथवा ककरो दबावसँ मैथिली विषय लेनिहार विद्यार्थी अखनो धरि पुस्‍तक केन्‍द्रक दुवारिपर हाजरी दैत बरोबरि भेटत । कारण जे दशम कक्षाक विधार्थी अखनो धरि नहि देखने अछि— दश किलासक मैथिली पोथी ।

धनुषा जिल्‍लाक लगभग एक दर्जन आ महोत्तरी जिल्‍लाक पर्सा पतैली लगायतक स्‍कूलमे मैथिली विषयक पढाई होइत अछि, मुदा विधार्थी आ शिक्षक दुनुगोटे मैथिलीक पुस्‍तक अखनधरि नई भेटलाकवाद फिरसान अछि । साझा प्रकाशनद्वारा प्रकाशित पुस्‍तक, जनक शिक्षा सामग्री केन्‍द्रद्वारा विधार्थीकलेल उपलब्‍ध कराओल जाइत अछि । जनकपुरधाम स्‍थित विद्यापति चौकपर रहल ‘विद्या पुस्‍तक केन्‍द्र’क विक्रेता कलानन्‍द झा कहलनि, ‘साझा प्रकाशनकेँ वेरवेर तगेदा कएलाकवादो मैथिलीक पुस्‍तक उपलब्‍ध नहि कराओल गेल’ ।

दुखक गप्‍प त ई अछि जे ताहिकालमे मैथिली विषयक पाठ्य पुस्‍तकक आभाव देखल गेल अछि, जाहिकालमे साझा प्रकाशनक अध्‍यक्ष छथि— मैथिलीक पैघ साहित्‍यकार/पत्रकार/कवि/फोरमक नेता/बहुतरास मैथिली संघ—संस्‍थाक अगुवा व्‍यक्‍तित्‍व श्री राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ । अपनाके मैथिलीक योद्धा आ साझा प्रकाशनक पहिल मैथिल/मधेशी चेयरमैन कहबामे गर्व कएनिहार कापड़िके पदपर पहुँचलाक वादो मैथिली पोथी नहि भेटव सर्वत्र आलोचनाक विषय बनल अछि ।
मैथिली विषयक पुस्‍तकक अभाव हएव, मैथिली भाषा आन्‍दोलनक व्‍यापकतामें सऽभसँ पैघ रोकावटकरुपमें देखाऽरहल अछि । मैथिलीक पाठ्य पुस्‍तकक सहज उपलब्‍धता जाधरि नई हएत ताधरि विद्यालयक शिक्षामें मैथिलीक पढाई मात्र भाषण धरि सीमित रहत । गणतन्‍त्र प्राप्‍तिकबाद मैथिलीकेा भजा कऽ भलेहिं कतेको मैथिल वरिष्‍ठ पदपर चलिगेल होथि, मुदा धरातलिय यथार्थ इएह अछि जे मैथिली काल्‍हियो पाछा छल आ एखनो सिसैकते अछि ।

Sunday, July 5, 2009

कि अछि ई चारि वर्ण आ छत्तिस जातिक फूलवारी ?


ध्रुव महतो

नेपालमे शाहवंशीय राजतन्त्रक आरम्भ पृथ्वीनारायण शाहसँ भेल अछि वएह नेपालके एकिकरण कएने रहथि, ताहिसँ हूनका राष्ट« निर्माता सेहो कहल जाइत छन्हि राष्ट« कहलासँ जनतेके बुझल जाइत छैक ताहिसँ नेपालीजनताके एकिकरण केनाइए नेपालक एकिकरण केनाइ अछि प्रश्न स्वभाविक अछि कि कोन आधारमे, केना नेपालक एकिकरण केलथि ?

वास्तवमे पृथ्वीनारायण शाह बाहुवली रहथि जे अपन बाहुवलक आधारमे नेपाली जनताके एकिकरण कऽ नेपालराष्ट«केँ एकिकरण कएने रहथि एकिकरणकबाद अपनाके ताई राज्यक राजा घोषित कएलथि अपनाद्वाराकहलगेल हरेक बातके कानून जकाँ मानवाक मनेवाकलेल सऽभके बाध्य कएलथि, विवशता वस सबके मानहिंपड़लनि आखिरमे एकटा विवश मनुष्य कइये कि सकैय ? आब शासन करबाकलेल एकटा शासन प्रणलीकआवश्यकता होएब स्वभाविके छल एहि सन्दर्भमें विचार केलनि कि जौं मनुष्य विभेद रहित भऽजाएत बाहुवलक आधारमें शासन करब कठीन होबऽसकैय, किया अखन बन्दुकक डरसँ सबकियो हमर आदेश मानत, मुदा आगामी दिनमें प्रजासब अपन वास्तविक अस्तित्वकेँ बुझलाकबाद एकजुट भऽजाएत तखन बन्दूकक बलपरशासन चलाएब कठीन भऽ सकैय

अन्तोगत्वा निर्णय केलथि कि जनताके विभेद रहित बनेनाई मूर्खता अछि, वरु छिन्नभिन्न कऽरखलाकबादे हमर बाहुवलक शासनक समय किछुए दिनकलेलपशुपतिनाथ कृपासँ टिकाऊ रहत एहि भयककारणसँ हमसब नेपालीक एकताक प्रतीक ओहि शाहवंशी राजसब कहल करैत छल जेपशुपतिनाथले हामीसबैको कल्याण गरुन् ताहिसँडिभाइड एण्ड रुलअर्थातफूटाउ राज करुके राजनीतिक प्रणली नेपालीजनताक उपर थोपव स्वभाविके छल ताही मनसायसँ प्रजाके सम्बोधन करैत कहलनि किहाम्रो नेपाल चारवर्ण छत्तीस जातको फुलवारी होमुदा ताहि समयक नागरिकसब एहि वाक्यक रहस्य बुझऽनईसकलाक बादोसुनिकऽ सब प्रसन्न भऽगेलथि अखन सेहो प्रायः नेपालीसब एकर अर्थ बिनु बुझने प्रसन्न भेल करैत छथि

भुजवल विश्व वस करि राखेसि कोउ स्वतन्त्र

मण्डलीक मनि रावण राज करइ निज मन्त्र ।।

रावण त्रmोध अनल निज स्वांश समिर प्रचण्ड

जरत विभिषण राखेउ दिन्हेउ राज अखण्ड ।।


पृथ्विीनारायण शाहसँ पूर्व, प्राचीन कालमे महाराजा मनु व्यवस्था केलनिकिछु लोकके पढाइलिखाइ नियम बनेबाक काजमे नियुक्त केलथि, जकरा ब्राम्हण कहलगेल, किछुके हातहथियार संचालन सुरक्षाकरबाक जिम्मेवारी देलनि जकरा क्षत्रिय कहलगेल किछुके धनसम्पति संग्रह खाद्य पदार्थक आपुर्तिकरवाक काजमे लगाओलगेल जकरा वैश्य कहलगेल एहि सबहक सेवामे नियुक्त काएलगेल लोकसबके शुद्रकसंज्ञा देलगेल

अतः मनुष्यमनुष्यक बीचमे भयंकर घृणाक भावना फैलयबाक काज पृथ्वीनारायण शाहसँ सेहो पूर्वहिं कालसँस्मृतिसब करैत आएल छल एवं पृथ्वीनारायण शाहक कार्यकालमे जाति प्रथाक जड़ि नीकजकाँ पसरिगेल छल वास्तवमे जन्ममे आधारित जातिप्रथा स्मृतिएसबहक देन होइतहुँचारि वर्ण छत्तीस जातिक फुलवारी नेपालकहिकऽ पृथ्वीनारायण शाह हूनक वंशजसब एकरा अनुशरण करैत जाति प्रथाके मजबुती दैत आएल अछि

सऽभ स्मृतिसब महाभारत कालकबादे लिखलगेलाक कारणें जन्ममें आधारित जातिप्रथाक उत्थान सेहो महाभारतकालक बादे भेल मानल जाऽसकैय ताई स्मृतिसबमें मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति पराशर स्मृति समाजमेबेसी प्रचलीत अछि इतिहासक विद्वानसब कहैत अछि कि महाभारत कालसँ अखनधरि ने कोनो मनु नामक राजाभेल, गौतमबुद्धक वाद याज्ञवल्क्य नामक रिषी

मौर्यवंशक अन्तिम सम्राट वृहद्रथक मृत्युवाद हूनक ब्राम्हण सेनापति पुष्यमित्र शूंगक शासन कालक उदय भेल पुष्यमित्र शुंग, भगवान बुद्धक सिद्धान्त सबकेँ खण्डन करैत जन्मेसँ निर्धारित ब्राम्हणसबहक पूज्यतामे आधारितचार्तुवण्र्य व्यवस्थाके स्थापित कएलथि धर्मशास्त्रक नामसँ स्मृतिसब ताहि समयमे प्रतिष्ठित भेल धर्मक दायित्वआचार्य गुरुसबके ताहि समयसँ देलगेल

पृथ्वीनारायण शाहक कार्यकालमें हूनक चारुकात फैलल घृणस्पद वंशावलीक सूचक लाखोकरोड़ो नामक, व्यवसायसबहक परिचायक छल धर्मक परिचायक नहिं छल ताइ लोकसबके अस्पृश्य घोषित करबाक धर्मकदायित्वलेने धर्माधिकारीसब, न्यायाध्यक्षसब हूनकासबद्वारा प्रदत्त स्मृतिजन्य व्यवस्थासब जाहि अनुसाररहनसहन एवं जीवन यापन करबाक काजकेँ धर्म कहल जाइत छल जकराचारि वर्ण छत्तिस जातिकनेपालकहि पृथ्वीनारायण शाहसँ अखनधरि हूनक वंशजसब सिञ्चित कएलनि राजतन्त्र आब नई अछि, समाप्त भऽगेल अतः हीन भावनाके सूचीत करऽवला आदिवासी, जनजाति, दलीत, चमार, डोम, कोलभील, केवट, कहार इत्यादि....जकर कोनो आधारे नहि अछि, आधारे नई रहल उपाधीसबसँ आइयो सटल रहबाकऔचित्य कि ? बहुत पैघ गल्ती अछि, अभिशाप अछि कियाकि यहि प्रकारसँ सटल रहब राजतन्त्र परिवर्तनभेलाक बादो जातीय पहिचानसबहक आधारमे नेपालीक फेर शोषण होएबाक संभावना अछि अतः हमरासब उपरथोपलगेल एहि जातीय उपाधिसबके त्याग कऽ अपन वास्तविकतासँ जूड़ी, इतिहासक मुख्यधारासँ जुटी

अखन अपना नेपालमे एकटा प्रश्न एकदम ओझराएल अवस्थामें अछि, जाहिसँ सबकियो डेरायल अछि अछि—‘जातिप्रथा चारि जाति छत्तीस वर्णक फूलवारी नेपाल अखन चारि जाति छत्तिस चूर्णमें परिणतभऽगेल अछि जातियताक बात लऽकऽ देश विखण्डन होएबाक खतरा बढि रहल अछि विविध जातजातिसबजातीय राज्यक माँग जोड़दाररुपसँ उठाऽरहल अछि जातीय आरक्षणक माँगसँ नेपाली आकाश गुञ्जयमानभऽरहल अछि प्रमुखरुपमें नेकपा माओवादी जातीवादके उठवैत देखापड़ि रहल अछि आनआन पार्टीसब सेहोअपनाके एहिसँ अछुत नई रखने अछि जातीवादक बात लऽकऽ दँगा सेहो होइत रहल अछि, एकटा मनुष्य दोसरमनुष्यकेँ खुन पिपासु बनल अछि, किया ? किया , प्रकृति सदैव अपनाके सर्वश्रेष्ठ रहल प्रमाणित करैत आएलअछि, एकटा भाई दोसर भाइसँ लड़ैत आएल अछि एहि तरहक जातीगुटबन्दी अज्ञान अविवेकसँ उत्पन्नहोइत अछि

एकरे परिणाम अछि कि सम्पूर्ण नेपाल लालकारी, उज्जरपियर रंगमें बाँटल अछि एक दोसरके दमनकरबाकलेल हातहथियार जम्मा करबाक होड़बाजीमें लागल अछि शीतयुद्धक वातावरण बनल अछि युद्धकहियो जाति जमीनकलेल होइत अछि कहियो व्यवसाय आकृतिक लेल, मुदा युद्ध निश्चित रुपसँ होएबेटाकरैत अछि, होइते रहत एहि युद्धक कारण जातिपाति, उँचनीच, छुवाछुत इत्यादि मनुष्यकेँ अन्तःकरणमेरहल राग द्वेष आदि प्रकृतिजन्य विकार सबहक देन अछि मुदा यहि युद्धके धर्मक सँग कोनो सम्बन्ध नहिअछि

आई चारि वर्ण छत्तीस जातिक चूर्ण नेपालमे जातिवादक नहि अछि ? सब जातीवादी बनिगेल अछि कियाजाति, सम्प्रदाय, भाषा क्षेत्रिय संकिर्णतासबकेँ आधार बनाकऽ चुनावमें टिकट देल जाइत हछि , ताहिजातिक लोकसबके चुनाक प्रचारमे पठाओल जाइत अछि हुनकेसबसँ प्रभावित भऽ हमसब अपन भोट सेहो दैतछी कर्मचारीसबहक नियुत्तिmमें सेहो कि हमसब जातिवादसँ अपरिचित छी ? मुदा मात्र कहलाधरिसँ होबऽवलानहि अछि, अपितु व्यवहारमे लागु करबाक बात अछि

हमसब कहैत छी, मुदा अपना व्यवहारमें लागु नई करैत छी तहन दोष ककरा देवै ? एकरालेल दोषीहमहीआँहाँ छी, जेकरा हमआँहाँ कहियो सरकारक आरक्षण नीतिमे तकैत छी, कहियो जातीय राज्यकनिर्माणमें तकैत छी कहियो एकरालेल धर्मके दोषी कहैत छी ओना धर्म शास्त्रसबमे कोनो एकौटा एहन श्लोकनहिं अछि जे भगवानद्वारा मनुष्यकेँ विभाजन काएलगेल हुए, उँचनीच, छुत या अछुत बनाओलगेल होए जातीवादकलेल दोष व्यवस्थाकारसब सेहो नहि अछि जे अपना समयक समाजक संचालनकलेल जातीवादसँसम्बन्धित कानूनसबके संरचना कएलनि वास्तवमे कहल जाए हमरेआँहाँक दोष अछि जे अखनोजातीवादके मानैत छी

सत्य कि अछि से बेगर जननहीं डिंगँ हँकैत रहैत छी सम्भवतः याह हमरा आँहाँके फोकटिया डिंगँ देखिकऽपृथ्वीनारायण शाह सोंचलथि जे नेपाल चारि वर्ण छत्तिस जातिक फूलवारी अछि, जकरा नामपर शासनकरब उपयुक्त रहत ताएँहेतु अपना समयक ओहि समाजिक व्यवस्थाकारसबकेँ गारि देबऽसँ नीक अपनामे सुधारकरब सबहकलेल उपयोगी भऽ सकैय

कि मधेशक अपेक्षाके पुरा करत ई सरकार ?





मनोज झा मुक्ति

देशमें एकिकृत माओवादीक सरकार हटलाकबाद लोकतान्त्रिक सरकाररुपमें माधव नेपालक अगुवाईमें सरकार निर्माणक प्रकृया शनै : शनै : आगा बढि रहल अछि । ओना सरकार निर्माणक प्रकृया शुरु भेला सेहो महिनासँ उपरे भऽगेल अछि आ दूइयो महिनाक बाद पुरा होएत से कठीने बुझाऽरहल अछि ।
सरकार निर्माणक त्रmममें बहुतो सहयोगी पार्टीसबमें मन्त्री बनवाकलेल अपनेमें दरार पड़िगेल अछि । किछु पार्टी त फुटिएगेल आ किछु फुटक किछेर पर पहुँचगेल अछि । एक्कहिटा पार्टीमें नहिं प्रायः सब पार्टीमें असन्तुष्टि उत्पन्न भऽगेल अछि । आओर जे जेना हुए, जाहि रुपे ‘सीताक श्रापल’ देशकेरुपमें नेपालके लेल जाइत छैक ताहि अनुरुप कोनो आश्चर्यक गप्प नहिं, जाइ तरहक एतुक्का परिवेश छैक, नेतासबहक विवेक छैक, ताहि अवस्थामे ई स्वाभाविके ।

नेपालमें सबसँ बेसी उपेक्षाक शिकार रहल मधेशक आकाँक्षा फेर एकवेर एहि लोकतान्त्रिक सरकारसँ तेजोबद्ध होवऽलागल अछि । आ ई स्वभाविके अछि, कियक त एहि सरकारमें अपनाके ‘मधेशीक पहिचान, सम्मान आ स्वाभिमान’क लेल लड़ऽवला पार्टी कहनिहार ‘तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी’ सेहो सहभागि अछि । ओना मधेशे मुद्दासँ अस्तित्वमे आएल मधेशी जनाधिकार फोरम आ मधेशीक बात कऽ कऽ एखनधरि टिकल सद्भावना पार्टी एहीस पहिलुका सरकारमें संलग्न छल । आ हूनकर सबहक मधेशप्रतिक बोली आ काजक मधेशी जनता समीक्षा कऽ चुकल अछि ।
ताइकेबाद अखन पहिलुका सरकारमें सहभागि नईभेल ‘सत्ता नहीं, प्रभुसत्ता चाहिए’के नारा दैत आविरहल तमलोपा, सरकारमें गेल अछि ते मधेशी जनतासब सरकार दिस होइ नई होइ, तमलोपा दिस टकटक्की लगौने अछि जे मधेशके ‘प्रभुसत्ता’क लेल पार्टी कि करत ? मधेशीवादी दलसबहक काज एवं रवैया देखिकऽ एक तरहें मधेशी जनता पहिनहिंसँ निराश भऽ कऽ बैसल अछि, तइयो क्षणिक काललेल मधेशक आशाक दृष्टि सरकारमें सहभागि तमलोपा दिस लागल अछि । मधेशक क्षणिक आशाक दृष्टिकेँ तमलोपा आ ओकर मन्त्रीसब कतेकधरि तृप्ति प्रदान कऽसकत से तमलोपाकलेल बहुत पैघ चुनौती रहल अछि आ याह एखुनका काज तमलोपाक भविष्य निर्धारण करत ।

तमलोपाक अँशमें तीनटा मन्त्रालयसब भेटल अछि, शिक्षा, उद्योग आ यूवा तथा खेलकुद । आन आन पार्टीक नजरिमें एहि मन्त्रालय सबकेँ महत्व भलेहिँ कम हुए, मुदा तमलोपाक लेल ई बहुत पैघ अवसर भऽ सकैय । ‘नीक अभिनेताक पुरस्कार पएवाकलेल नाटकमें नायकके भूमिका भेटय से कोनो जरुरी नई छैक, नाटकक एक सिनमें मात्र भूमिका रहल पात्र सेहो अपना अभिनयक बलपर उत्कृष्ट अभिनेताक रुपमे पुरस्कृत भऽ सकैय’, एहि बातके तमलोपाके मूलमन्त्रके रुममें लेब पड़तैक । एहि तरहक संस्कारी नेता रहल देशक जम्बो सरकारमें कतेक काज भऽ सकैय, ताइसँ मधेशी जनता अज्ञान नहिं अछि । तमलोपाके कि करब उचीत भऽ सकैय त ?

तमलोपाक भेटल शिक्षा मन्त्रालय मार्फतसँ मधेशमें विश्वविद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रतिष्ठान, विश्वविद्यालय सबहक प्रत्येक तहमे समावेशीकरणक बातके लागु केनाई, शिक्षा नीतिमे सुधार कऽ असल शिक्षा प्रणाली लागु करबाक चुनौती रहल अछि । मधेशकलेल शिक्षा मन्त्रालय अन्तर्गत रहल सिटीभिटी, अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र सबसँ नीकजकाँ काज काएल जाऽसकैय । तहिना उद्योग मन्त्रालयक मादे सिमेन्ट फैक्ट«ी सबकेँ गुणस्तर बढेबाक, मधेशमे नयाँ नयाँ उद्योगक स्थापना आ देशमें बन्द रहल उद्योगके पुनः संचालन करब मुख्य चुनौती पूर्ण काज रहल अछि ।

एहि तरहें सब पार्टी आ सरकारक उपेक्षाक सिकार बनल रहल यूवा तथा खेलकूद मन्त्रालयक मादे तमलोपा अपन आ मधेशक काया पलट करऽ सकैय । मधेशक यूवाके परिचालन कऽ देशमें खेलकूदक माहौलके श्रृजना करबाक बहुत पैघ अवसर तमलोपाक हाथमें आएल अछि । मधेश लगाएत देशक विभिन्न ठाममें ग्राउण्डक निर्माण, खेलाडी आ प्रशिक्षकके प्रोत्साहन करैत खेलक माध्यमसँ देशके आगा बढेबाक काज तमलोपा कऽ सकैय । ताइके लेल सबसँ पहिने सब मन्त्रालयमें रहल राजनीति नियुक्तिबला सीटके जते जल्दी हुए खाली कराबिकऽ अपन आ ठोस आदमीके राखबाक पहिल काज करऽ पड़तैनि । फेर अपन आदमी रखबाक नामपर जकरे मोनभेल तकरे राखऽ (कार्यकर्ता भर्ती केन्द्र बनाबऽ)सँ परहेज करैत सम्बन्धित क्षेत्रक विज्ञतापर सेहो ध्यान देवऽ पड़तैनि

सरुवा, बढुवा आ नियुक्ति देवऽसँ बेसी महत्व मधेशक सार्वजनिक काजके देबाक नीतिके आगु लाबऽ पड़तनि । जौं अपन आ नीकलोकके नई राखि मात्र डाक बढाबढ करैत पाइएक बले जथाभावी नियुक्त करैत गेल त तकर परिणाम सेहो भोगवाकलेल तमलोपाके तैयार रहऽ पड़तैनि ।

एहि सरकारमें सहभागिताक तुरत्त बादसँ तमलोपा मधेशक जनताक गिन्तीक मीटरपर चढिगेल अछि । आब देखबाक मात्र ई अछि कि अपन नाम अनुसार जतबे कऽसकी से काज करैत अपन सकारात्मक काजसँ तमलोपा अपन स्थान बनवऽमे सफल रहत या अखनधरिके मधेशकलेल देलगेल भाषण मात्र भाषणे छल से सिद्ध करत ? मधेशक आश बनल रहत या विकल्पक खोजिमें मधेशक आँखि फेरसँ पसरत !

Thursday, June 4, 2009

मल्ल काल आ मैथिली साहित्य



काठमाण्डू उपत्यकामे मल्लकालिन समयमें भेल मैथिली साहित्यिक विकासकें स्वर्णकाल मानल जाइत अछि । मल्लकालिन समयमें मैथिली काठमाण्डू उपत्याक राजकाजक भषाके दर्जा पओने छल । प्रायः सऽभ मल्ल राजा लोकनि मैथिली भषामें साहित्यक रचना कयने छलाह । मैथिली साहित्यमे अपन योगदान देनिहार किछु कवि मल्लराजा आ हूनक कृतिके सन्दर्भमें किछु जानकारी प्रस्तुत अछि ।

१. सिद्धिनरसिंह मल्ल(१६२०—१६५७) ः— हरिहरसिंहक पश्चात ई ललितपुर—पाटनशाखाक सुप्रसिद्ध साहित्यानुरागी राजा भेलाह । ओ शासक रहितहुँ सन्यासी जकाँ धर्मकर्ममें लीन रहैत छलाह । कृष्ण मन्दिरक शिलालेखमे हूनका युधिष्ठिरक समान धर्मात्मा, अर्जुनक समान परात्रmमी आ कर्णक समान दानी कहल गेल अछि । वस्तुतः ओ कोटाहुति यज्ञ कऽ अपन भक्ति—भावकेँ साकार कए देल तँ कृष्णविनायक पदावलीक रचना तथा कार्तिक नाचक प्रवर्तन कए साहित्य आ नृत्यक प्रति अपन सर्जनात्मक प्रतिभा सेहो अभिव्यक्त कएलनि ।ओना सिंहभूपतिक नामसँ प्रख्यात भेल एहि कविकेँ अनुमानहिसँ सिद्धिनरसिंह मल्ल कहलगेल छन्हि । एहिसँ पहिने नरेन्द्रनाथ गुप्त सिंहभूपतिके शिवसिंह अथवा विद्यापतिक उपाधि मानिलेने छलाह, मूदा ओ भ्रामक सिद्ध भेल । सिंहभूपतिक ‘रागतरंगिणी’ आ ‘नानारागगीतम्’ में दू÷दू गोट पद संग्रहित काएलगेल अछि । हिनक एकगोट पद ‘भाषा—गीत संग्रह’ में सेहो भेटैत अछि । हिनक किछु पंत्तिm एहि तरहक अछि ः—

सबहुँ सखि परबोधि कामिनि अनि देल पिय पास ।

जनि बाँधि व्याधञे विपिन सञो मृग तेजय दीघ निसास ।।

बैसलि शयन समीप सुवदनि जतने समुखि न होए ।

भेल मानस बुलय दहो दिस देल मनमथ फोए ।।

२. भूपतीन्द्र मल्ल(१६९५—१७२२) ः— जितामित्र मल्लकबाद भक्तपुरक राज भेल भूपतीन्द्र मल्लक स्थान नेपालक उत्कृष्ट कविगणमें उच्चतम अछि । ई विषेशतः भक्ति विषयक पदक रचना कएलन्हि । शिव, गौरी, हरि ओ शक्तिक अर्चना विषयक हिनक पदसऽभ छन्हि । हिनक पद एक पदावलीमे संकलित अछि, जकर अन्वेषण डा. बागची कएलन्हि । श्रीझबाली अपन ‘नेपाल उपत्यकाको मध्यकालीन इतिहास’ मे १०० मैथिली गीतक हिनक एकटा संग्रहक उल्लेख कएने छथि । हिनक बहुतो पद शिलोत्कीर्ण सेहो उपलब्ध अछि । हिनक किछु पंत्तिm एहि तरहक अछि ः—

पीत वसन कुमित विराज, खगपति आसन विराज

शंख चत्रm गदा पद्म वाहु सहास......

भूपतीन्द्र हरि गुण गाव ।

पदयुग सुन्दर हृदय विहाव ।।

३. जगज्ज्योतिर्मल्ल(शासन १६१३—१६३७) ः— संगीतशास्त्रक बड़का संरक्षकके सँगहि सुकवि रहल जगज्ज्योतिर्मल्लक दरबारमें अनेक मैथिल विद्वानसऽभ आश्रय पवैत छलाह । ‘मुदितकुवलयाशव(१६२८)’,‘हरगौरीविवाह(१६२९)’,‘कुंजविहारनाटक’ आदि हिनक रचना कहल जाइत अछि । तहिना विविध भाव—विषयक पदसंग्रह ‘गीतपंचाशिका’ सेहो उपलब्ध भेल अछि, जाहिमें भक्ति ओ श्रृँगारक अतिरिक्त बृद्धावस्थाक वर्णन, नवरसक वर्णन, विरहावस्थाक वर्णन संगृहीत अछि । हिनक किछु पंत्तिm एहि तरहक अछि ः—

कुसुम साजल सेज परिहर दूर, तोहे बिनु हृदयहोअए तसु झूर

जतन करए तुअ दरसन लाई, अविरल नयन नीर बहि जाई ।

अनुखन तोहर धरए धेयान, लए कुंकुम लिह तनु अनुमान ।

पए परि पुन पुन कर अनुताप, खन हँस खन रुस करए विलाप ।

नृप जगजोतिमल इहो सर गाय, दूति उकुति बुझ आठओ भाव ।

४. जगतप्रकाश मल्ल(शासन १६३७—१६७२) ः— हिनक अनेक मैथिली पद,‘पदसमुच्चय’, नानासंग गीतसंग्रह, ‘गीतपंचक’ अदिमें उपलब्ध अछि, विषयानुत्रmमें जे एहि प्रकारक अछि ः— १. भगवानक दशावतारक पद, २. विष्णुपद एवं ३. सदाशिवक पद । दरबार पुस्तकालयमे हिनक सात गोट नाटक सुरक्षित अछि, जाहि मध्य ओ मैथिली गद्यक बड़ सुललित प्रयोग कएने छथि । ओ नाटक सऽभ अछिः— ‘उषाहरण’, ‘नलीय नाटक(१६७०)’, ‘पारिजातहरण’, ‘प्रभावतीहरण(१६५६)’, ‘मलयगन्धिनी’, ‘मूलशशिदेवोपाख्यान’ एवं ‘मदनचरित’ । वस्तुतः जगतप्रकाश मल्लक समय मैथिली साहित्य—संगीतक उत्कर्ष नेपाल मध्य चरम सीमापर पहुँचि गेल छल आ एहि उत्कर्षमें हुनक महत्वपूर्ण योगदानक एहिसँ अनुमान कएल जाऽसकैया जे मध्ययुगीन इतिहासमे ओ ‘गन्धर्वविद्या—गुरु’ एवं ‘कविन्द्र’ नामे. प्रख्यात भेलाह । हिनक किछु पंत्तिm एहि तरहक अछि ः—

मोह ईसर कयल पितृ वनवास, तुअ पद पंकज मोरा आस ।

तिलक राख रताह तालक यति, बाम दिस नलय धरु मधुर जति

कान कुंडल अहि हाल मुण्डमाल ।

५. प्रताप मल्ल(१६४१—१६७४) ः— नरसिंह मल्लकबाद कान्तिपुरक राजा भेल, कवीन्द्र उपाधिसँ प्रख्यात प्रताप मल्ल पैघ विलासी छलाह । कूचबिहारक राजा वीरनारायणक पुत्री रुपमतिसँ, कर्णटकन्या राजमतीसँ, महुत्तरी राज्याधिपति कीर्तिनारायणक पुत्री लालमती आ अनन्तप्रिया, प्रभावती प्रभृतिसँ काएलगेल हूनक विवाह एकरा प्रमाणित करैत अछि । ओ संस्कृतज्ञ आ भाषाकविक संग—संग संगीत—नृत्य एवं तन्त्रादिक मर्मज्ञ सेहो रहथि । प्रताप मल्लक पदावली राष्ट«ीय अभिलेखालयमे सुरक्षित ‘गीतप्रतापमल्लीयम्’, ‘गीतागोविन्दम् प्रतापमल्लस्य’ आ ‘प्रतापमल्ल विरचित गीतम्’ प्रभृति गीतसंग्रहसबमे उपलब्ध होइत अछि । कान्तिपुरक तुलजाभवानीक मन्दिरमे उत्कीर्ण एकटा शिलालेखमे हिनक देवीवन्दना विषयक नौटा पद उपलब्ध होइत अछि जे उत्तम कवित्व आ प्रांजल भाषा—शैलीक दृष्टिएँ वस्तुतः हिनक ‘कविन्द्र’ उपाधिकेँ सार्थक बनबैत अछि । हिनक किछु पंत्तिm एहि तरहक अछि ः—

हेरह हरषि दूष हरह भवानि । तुअ पद सरण कएल मने जानि ।

मोय अति दीन हीन मति देष । नर करुणा देवि सकल उपेषि ।

कतनय करय सहस अपराध । तैअओ जननि कर वेदन बाध ।

परतापमल्ल कहए कर जोरि । आपद दूर कर करनाट किशोरि ।

६. श्रीनिवास मल्ल(१६५७—१६८५) ः— ललितपुर पाटन शाखाक कवि सिद्धिनरसिंहक बालक निवास मल्ल सेहो सुकवि छलाह आ मिथिलामे हिनक सुप्रसिद्ध प्रमाण ई अछि जे लोचनपर्यन्त अपन ‘रागतरंगिणी’ सन ग्रन्थमे हूनक पद उद्घृत कएलगेल । जगज्ज्योर्ति मल्लक पौत्र जगतप्रकाश मल्लक संग हिनक मैत्री छल से ‘मलय—गन्धिनी’क ‘ शिरिनिवास भूपतिशरण लेल जगतप्रकाश अति ताह सुख देला ।’सँ स्पष्ट होइत अछि । हिनक किछु पंत्तिm एहि तरहक अछि ः—

उपमिअ आनन नीज पंकज ससधर दिवस भलीने ।

भौहँ अनूपम अधर सोहाञोंन, नवपल्लव रुचि जीने ।।

सुन पेअसि की मोर, परल गरुअ अपराधे ।

वह मलयानिल जार कलेवर, न कर मनोरथ बाधे ।।

७. नृपमल्लदेव ः— ई निश्चित रुपमें कहल जाऽसकैय जे नृपमल्लदेव एक गोट प्रतिभाशाली सुकवि रहथि । जकर प्रमाण रुपमें हिनक एकटा विलक्षण पद ‘भाषगीत संग्रह’ आ एकटा ‘नेपाल—तालपत्र विद्यापति—गीत संग्रह’में सेहो उपलब्ध होइत अछि । रातिक चारिम पहरमे नायिकाकेँ विदा करबाक दूतीक वचन सुनि कविक निम्नलिखित उक्ति कतेक सरस आ अर्थ गर्भित अछि जे विशुद्ध मिथिलाभाषाक स्वभाविक शब्द —विन्यासमे श्रुँगारिक सहृदयताक मधुर अभिव्यक्ति कविक काव्यकुशलताक सूचना दैत अछि ः—

मल्लदेव नृप कैतय वचन सुनि तोहेँ दुति दुरमति जाती ।

ऐसनि प्रीति कैसे विघटाबह दुहु दिसँ दोगुन माती ।

८. रणजीत मल्ल(१७२२—१७७१) ः— भूपतीन्द्र मल्लक पश्चात् भक्तपुरक अन्तिम नरपति भेल रणजीत मल्लक समयमे सर्वाधिक संख्यामे नाटकक रचना भेल आ हिनकहि आश्रित भऽ काशीनाथ, धनपति, गणेश प्रभृति कवि —नाटककार साहित्य साधना कएलनि । हिनके पराजित कऽ पृथ्वीनारायण गोर्खा राज्यक विस्तार भक्तपुरधरि केलक ।

नेपालक अधिकाँश पदावली—साहित्य एखनहुँ धरि अप्रकाशिते अछि तेँ सर्वजन सुलभ नहि अछि । तथापि जएह किछु सामग्री अपलब्ध अछि ताही आधारपर एतऽ मल्ल राजा लोकनिक राज्याश्रयमे विकसित प्राचीन काव्य—धाराक रुपरेखा मात्र एतऽ प्रस्तुत अछि आ ताहूसँ मैथिली काव्य—साहित्यक हेतु नेपालमें उपस्थित ओहि स्वर्ण—युगक नीक जकाँ परिचय भेटि जाइत अछि । मुदा ई रुप—रेखा पूर्ण नहि कहल जाऽसकैत अछि ।


स्रोत मैथिली साहित्यक इतिहास

Monday, May 25, 2009

सांस्कृतिक संगम


सांस्कृतिक संगम
सभसं पहिल फ़ोटो देखियौ । वामकात बैसलि व्रती महिला काठमाण्डू रहनिहारि छैथ । हुनक नाम छन्हि ज्योति महर्जन(आब झा) । ओ बरसाइत पूजि रहल छैथ अपन जेठ ननैद अर्चना झा संग ।

मैथिली भाषा, संस्कृति, संस्कारसं दूर काठमाण्डुमे पलल बढल ज्योतिके बरसाइतक बियनि आ बरक पातके महत्व आब निक जका बुझल छन्हि । भलेहि ओ कहियो एहन ककरो करैत नई देखने रहैथ । तें आब घोघ तानिक'हुनका बरसाइत पुजैत देखि ककरो छुबुद्धि लगनाई अस्वभाविक नहि । अन्तरजातीय विवाह कएलाक बाद ज्योती आब मैथिली संस्कृतिसं पुरा तरहसं परिचित भ' गेल छैथ । मिथिलाक संस्कृति एहन अछि जे सभके अपनामे समेटिक' आगु बढैत अछि रहैया ।

पतिक दीर्घायुक कामना
पतिक दीर्घायुक कामना करैत रविदिन मिथिलान्चलक महिला बरसाइत (बट सावित्री) पाबनि पुजलनि। जनकपुरमे भोरेसं राममन्दिरक आगुके बड गाछलग स्त्रीगणक भीड लागल छल । ब्रातालु महिला भोरेसं नदी , पोखरिमे जा क' स्नान क' बरक गाछतर परम्परागत रुपसं पुजा पाठ कएलनि । मिथिलान्चलमे महिला बडड श्रद्धाक संग ई पावनि मनबैत अछि । सावित्री आ सत्यवानक जीवनगाथासं ई व्रत जोडल हएबाक कारणे अहिवातक लेल महत्वपूर्ण मानल गेल अछि । वरको गाछमे जल चढाओल जाइत अछि त नवका बांस आ तारक पंखासं वरके गाछके होंकल जाइत छै । व्रतालु स्त्रीगण एहि दिन प्रात: काल नित्यकर्म क' सासुर आनल कपडा लगा साथी संगीसभ संगे मंगलगीत गबैत वडक गाछके पूजैत अछि । व्रती महिला निष्ठापुर्वक गौरी आ विषहरके पूजा क' अन्त्यमे सत्यसावित्री तथा सत्यवानक कथा सुनैत अछि । एहि व्रतक एàतिहासिक महत्व रहलाक कारणे मिथिलांचलमे ई बहुत महत्व र विशेषता रखैत अछि । मैथिल स्त्रीगण अपन गाम ठामसं कोशो दुर रहितो परम्परागत रुपसं पुजैत छैथ ।

Thursday, May 7, 2009

हमसब कतऽ छी ?

मनोज झा मुक्ति
देश संघीयतामें जाएब प्रायः निश्चित अछि । सब भाषा—भाषी, जातजाति लोकनि अपन—अपन भषा—सँस्कृतिके जागरण करबामें जुटिगेल अछि । ताही अनुरुप मैथिली भाषीसब सेहो जागृत भेल छथि । मुदा ई एहि तरहक जागृति मात्र देखवामें अवैत अछि जे देखावाधरि बुझाऽरहल होए । मिथिला आ मैथिलीक नामपर किछु भेट जाए या राजनीति करैत रही ताइ तरहक काज मात्र भऽरहल अछि ।

ठीक छई, राजनीति केनाई कोनो खराब गप्प नई मुदा जाहि नामपर राजनीति करैत छी तकरा पूर्णरुपेण बिसरि जेनाई कतेक नीक बात । दोसर केलक तकरा मानब नई आ अपनेसँ करब नई, एहि तरहक सोंच सँ बाँचिरहल, अपनाके मात्र मैथिलीक ठिकदारी लेने जँका बात कएनिहारसबके अपन सँस्कार, अपन सँस्कृतिके याद कोना बिसरा जाइत छन्हि ? æहम नई करब त केओ नई करय, हमही मात्र मैथिलीक अभियानी आ दोसर केओ मैथिलीक काज करय त ढोंगी”, ताई तरहक दरिद्र मानसिकताक लोकसबके देखिकऽ एकटा मैथिलीक पुतके दुःख भेनाई स्वभाविक होइत अछि । प्रसँग अछि २०६६ सालक मैथिली दिवस अर्थात जानकी नवमीके ।

कोनहुँ मञ्चपर या कतौ मैथिली आ मिथिलाक काजप्रति अप्पन एकाधिकार मात्र रहल सन—सन मूर्खतापूर्ण सोंच रखनिहारके कि मैथिल आ मिथिलाके आदर्श, सीता बिसरा गेलनि ? जानकी नवमी अर्थात मैथिली दिवसके अवसरपर खास कऽ काठमाण्डूमें देखलगेल उदासीनता कि ई नई प्रष्ट करैत अछि जे ओ भाषण कयनिहारसब कतेक मिथिला आ मैथिलीप्रति सजग छथि ? ओऽत धन्यवाद देवाक चाही काठमाण्डूक शान्तिनगरमें स्थित मैथिल यूवा क्लवबलाकेँ जे अपन स्थापना कालहिँसँ प्र्रत्येक वर्ष जानकी नवमी अर्थात मैथिली दिवस मनवैत आएल अछि ।

ककरो गारि पढनाई या खोदवेद केनाइ सामान्य एवं सरलबात छई, मूदा केनाई ओतवे कठीन । जौं अपने नई कऽ सकैत छी आ कमसकम करऽवलाके सराहना नई करऽ सकैछी तहन आलोचनो त नई करियौ । हँ, कोनो काजक समीक्षा अवस्य होएबाक चाही जाईसँ आगादिनमे परिपक्वता अवैक, किया त कियो पेटेसँ सबकिछु सिखिकऽ नई आएल रहैत छैक ।
ओना हमरा सभमे एकटा अवगुण यहो अछि कि जे कियो भाषण करैत छथि हुनकरबात हमसब एक्कहीवेरमे स्विकार कऽलैत छी । हमसब कहियो ई बुझबाक कोशिश नई करैत छी जे ओ भाषण देनिहार अपना जीवनमे कतेक ताई बातके पालना करैत अछि ? संस्कार, सभ्यता आ सँस्कृतिके भाषण देबहीटा मात्रसँ ककरो नेता या अभियानी मानि ली ? या हुनकर काज एवं हुनकर जीवन पद्धतिके सेहो देखनाई जरुरी छई ? कि देशमें गणतन्त्र एहिलेल मात्र आएल छई जे जकरा जे मन लगै बजैत रहय, लिखैत रहय ? जौं वास्तविकरुपमे हमसब, खासकऽ मैथिल यूवासब ताहि तरहक प्रवृति रहल लोकके खुलेआम, सबहक बीचमें उदाङ्ग नई करबै त एहि तरहक ठग प्रवृति रहल लोकके मनोबल बढैत—बढैत समाज आ देशके मटियामेट होएव निश्चित अछि । æहम ई केने रही, हम ओ केने रही” ई माला मात्र जाप क कऽ अपन बराई अपने करबाक प्रवृतिके अन्त जाऽधरि नई होएत विशेष कऽ मिथिला आ मैथिलीक समृद्धि असम्भव अछि ।

एकर मतलव ई नहिं कि काज कयने लोकके सम्मान नई भेटवाक चाही से, जे कियो मिथिला आ मैथिलीकलेल कनियोटा काज केने छथि ओ सम्मानक पात्र छथि आ जे केओ कोनो छोट या पैघ काज मिथिलाकलेल करताह ओहो सम्मानक पात्र होएताह । æहम जौं कोनो तरहक नीक या खराब काज करब त ओकर सम्मान या दुत्कार हम अपने नई कि इतिहास करतै” ताईबातके मनन कऽ बुझनाइ जरुरी भऽ गेल अछि ।

जानकी या मैथिलीके अपन जननी, अपन प्रेरणाक श्रोत कहैत हमसब नई थकैत छी, मूदा सीता जयन्तिमे जानकीके हमसब बिसरि जाइत छी । जौ वास्तविकरुपमे आहाँ मिथिला आ मैथिलीक हितैषी छी त नयाँ मैथिल पुस्ता जिनका अपन सँस्कृतिके सम्बन्धमे नईं बुझल छन्हि हुनका बुझेवाकलेल, आन—आन समुदायक लोकमे अपन सँस्कृतिक महानता देखयवालेल हमरासबके पहिने अपना सभ्य आ सुसँस्कृत भेनाइ अति आवश्यक अछि । मिथिलाके प्र्रत्येक पावनि—तिहार, दिवस—समरोहके खुलारुपसँ मनावहिटा परत, जौं अपनाके अभियानी या मिथिलाक ठिकदारके दावी करैत छी तहन ।

एकटा सर्वसाधारण मैथिलके अपना राजीएरोटीसँ फुरसति नई छई आ ओसब अपना आपके ठिकदारो रहल दावी नईं करैत छथि । बातेसँ नईं अपन जीवनशैली आ अपन काजसँ देखावऽ परत जे कोन—कोन कारणे मिथिलाके अनदेखी कऽ कोनो सरकार या समुदाय नई जाऽसकैया ।